मेरे प्यारे दोस्तों मैं मोहम्मद अश्फाक मैं बिहार के वैशाली जिला के हाजीपुर का एक आम नागरिक हूँ मैं कोई फिल्म स्टार,नेता,बड़ा वयापारी,लेखक या कोई फेमस आदमी नहीं हूँ बल्कि एक सीधा और सच्चे राह पर चलने वाला एक आम इंसान हूँ जिसके सीने में दिल है जो हर तकलीफ,हर ख़ुशी,हर ग़म महसूस जिसने अपने जिंदगी में बहुत साड़ी मेरे पिता का नाम मोहम्मद शमीम अहमद है। उनके पिता का नाम मोहम्मद जमील अहमद है, मेरे पिता के दो माँ थी जिनका नाम आमना खातून और सलमा खातून था। मेरे पिता को दोनों माँ से चार भाई और तीन बहनें थीमेरे पिता सभी भाई बहन से बारे थे और बड़े होने के कारण सभों की जिम्मेदारी उन्ही के कंधों पर था और सभी भाई बहन छोटे थे इस लिए वो कमा नहीं सकते थे और मेरे पिता के बाद वाले मेरे चाचा पढ़ने में बहुत तेज थे इस लिए मेरे पिता ने उन्हें पढ़ने के लिए कह कर फिर से कलकत्ता चले गए कमाने के लिए। अब जबकि सब ख़तम हो चूका था तो उन के पास इतने पैसे भी नहीं थे के वो कोई व्यापार करते इस लिए उन्हों ने पहले किसी के के पास फुटपाथ पर काम करना शुरू किया और वही खाया पिया और फुटपाथ पर ही सोये कियूं के ये जमाना पैसों वालों का है इस लिए मेरे पिता को किसी ने शरण नहीं दिया और न ही मेरे पिता किसी के पास हाथ फ़ैलाने गए। आहिस्ता आहिस्ता उन्हों ने काम कर के पैसा जमा किया और फिर उसी फुटपाथ पर अपना माल लाकर बेचना शुरू किया उसके बाद कलकत्ता के धर्मतल्ला के जिस जगह पर हजारों दुकाने लगती थी उन सभी दुकानों के यूनियन का सेक्रटरी बना दिया गया। उसके बाद मेरे पिता हाजीपुर आये और हम सभी को मतलब अपने फॅमिली को लेकर कलकत्ता जाने लगे चाचा जिनका नाम (अंजुम ) उन्हें ने उनके साथ जाने की जिद्द कर ली तो मेरे पिता ने उन्हें भी साथ ले लिया और बाकी सभी को यही अपने दादा वाले घर पर छोड़ दिया और वही से कमा कर यहाँ और वह दोनों तरफ का खर्चा पूरा करने लगे।
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